सानी-पानी मैं करूँ, गाय-भैंस मैं दुहूँ, दूध ले कर बाजार मैं जाऊँ। यह गृहस्थी जी का जंजाल है, सोने की हँसिया, जिसे न उगलते बनता है, न निगलते। लड़की है झुनिया, वह भी नसीब की खोटी। तुम तो उसकी सगाई में आए थे। कितना अच्छा घर-बार था। उसका आदमी बंबई में दूध की दुकान करता था। उन दिनों वहाँ हिंदू-मुसलमानों में दंगा हुआ, तो किसी ने उसके पेट में छुरा भोंक दिया। घर ही चौपट हो गया। वहाँ अब उसका निबाह नहीं, जा कर लिवा लाया कि दूसरी सगाई कर दूँगा,
सानी-पानी मैं करूँ, गाय-भैंस मैं दुहूँ, दूध ले कर बाजार मैं जाऊँ। यह गृहस्थी जी का जंजाल है, सोने की हँसिया, जिसे न उगलते बनता है, न निगलते। लड़की है झुनिया, वह भी नसीब की खोटी। तुम तो उसकी सगाई में आए थे। कितना अच्छा घर-बार था। उसका आदमी बंबई में दूध की दुकान करता था। उन दिनों वहाँ हिंदू-मुसलमानों में दंगा हुआ, तो किसी ने उसके पेट में छुरा भोंक दिया। घर ही चौपट हो गया। वहाँ अब उसका निबाह नहीं, जा कर लिवा लाया कि दूसरी सगाई कर दूँगा,