दर्शकों की टोलियाँ आने लगीं। दस बजते-बजते तीन-चार हजार आदमी जमा हो गए। और जब गिरधर झिंगुरीसिंह का रूप भरे अपनी मंडली के साथ खड़ा हुआ, तो लोगों को खड़े होने की जगह भी न मिलती थी। वही खल्वाट सिर, वही बड़ी मूँछें, और वही तोंद! बैठे भोजन कर रहे हैं और पहली ठकुराइन बैठी पंखा झल रही हैं।
ठाकुर ठकुराइन को रसिक नेत्रों से देख कर कहते हैं - अब भी तुम्हारे ऊपर वह जोबन है कि कोई जवान देख ले, तो तड़प जाए। और ठकुराइन फूल कर कहती हैं, जभी तो नई नवेली लाए!
दर्शकों की टोलियाँ आने लगीं। दस बजते-बजते तीन-चार हजार आदमी जमा हो गए। और जब गिरधर झिंगुरीसिंह का रूप भरे अपनी मंडली के साथ खड़ा हुआ, तो लोगों को खड़े होने की जगह भी न मिलती थी। वही खल्वाट सिर, वही बड़ी मूँछें, और वही तोंद! बैठे भोजन कर रहे हैं और पहली ठकुराइन बैठी पंखा झल रही हैं।
ठाकुर ठकुराइन को रसिक नेत्रों से देख कर कहते हैं - अब भी तुम्हारे ऊपर वह जोबन है कि कोई जवान देख ले, तो तड़प जाए। और ठकुराइन फूल कर कहती हैं, जभी तो नई नवेली लाए!