उससे कहीं ज्यादा झंझट बढ़ जायगा। इसमें ऐसी कौन-सी लगने वाली बात थी कि वह इतना बिगड़ उठा। हो न हो, यह आग झुनिया की लगाई है। वही बैठे-बैठे उसे यह मंतर पढ़ा रही है। यहाँ सौक-सिंगार करने को नहीं मिलता, घर का कुछ न कुछ काम भी करना ही पड़ता है। वहाँ रुपए-पैसे हाथ में आएँगे, मजे से चिकना खायगी, चिकना पहनेगी और टाँग फैला कर सोएगी। दो आदमियों की रोटी पकाने में क्या लगता है, वहाँ तो पैसा चाहिए। सुना, बाजार में पकी-पकाई रोटियाँ
उससे कहीं ज्यादा झंझट बढ़ जायगा। इसमें ऐसी कौन-सी लगने वाली बात थी कि वह इतना बिगड़ उठा। हो न हो, यह आग झुनिया की लगाई है। वही बैठे-बैठे उसे यह मंतर पढ़ा रही है। यहाँ सौक-सिंगार करने को नहीं मिलता, घर का कुछ न कुछ काम भी करना ही पड़ता है। वहाँ रुपए-पैसे हाथ में आएँगे, मजे से चिकना खायगी, चिकना पहनेगी और टाँग फैला कर सोएगी। दो आदमियों की रोटी पकाने में क्या लगता है, वहाँ तो पैसा चाहिए। सुना, बाजार में पकी-पकाई रोटियाँ