रायसाहब ने आहत नेत्रों से देखा - आप मुझे इतना बेईमान समझते हैं?
तंखा ने कुरसी से उठते हुए कहा - इसे बेईमानी कौन समझता है! आजकल यही चतुराई है। कैसे दूसरों को उल्लू बनाया जा सके, यही सफल नीति है, और आप इसके आचार्य हैं।
रायसाहब ने मुट्ठी बाँध कर कहा - मैं?
'जी हाँ, आप! पहले चुनाव में मैंने जी-जान से आपकी पैरवी की। आपने बड़ी मुश्किल से रो-धो कर पाँच सौ रुपए दिए, दूसरे चुनाव में आपने एक सड़ी-सी टूटी-फूटी कार दे कर
रायसाहब ने आहत नेत्रों से देखा - आप मुझे इतना बेईमान समझते हैं?
तंखा ने कुरसी से उठते हुए कहा - इसे बेईमानी कौन समझता है! आजकल यही चतुराई है। कैसे दूसरों को उल्लू बनाया जा सके, यही सफल नीति है, और आप इसके आचार्य हैं।
रायसाहब ने मुट्ठी बाँध कर कहा - मैं?
'जी हाँ, आप! पहले चुनाव में मैंने जी-जान से आपकी पैरवी की। आपने बड़ी मुश्किल से रो-धो कर पाँच सौ रुपए दिए, दूसरे चुनाव में आपने एक सड़ी-सी टूटी-फूटी कार दे कर