आँखों में आँसू भर कर सहुआइन से बोली - तुम्हारे पैसे मैं फिर दे दूँगी सहुआइन! आज मुझ पर दया करो।
सहुआइन ने उसे दयार्द्र नेत्रों से देखा और मातादीन को धिक्कार-भरी आँखों से देखती हुई चली गई।
तब सिलिया ने अनाज ओसाते हुए आहत गर्व से पूछा - तुम्हारी चीज में मेरा कुछ अख्तियार नहीं है?
मातादीन आँखें निकाल कर बोला - नहीं, तुझे कोई अख्तियार नहीं है। काम करती है, खाती है। जो तू चाहे कि खा भी, लुटा भी, तो यह यहाँ न होगा। अगर तुझे यहाँ न परता पड़ता हो,
आँखों में आँसू भर कर सहुआइन से बोली - तुम्हारे पैसे मैं फिर दे दूँगी सहुआइन! आज मुझ पर दया करो।
सहुआइन ने उसे दयार्द्र नेत्रों से देखा और मातादीन को धिक्कार-भरी आँखों से देखती हुई चली गई।
तब सिलिया ने अनाज ओसाते हुए आहत गर्व से पूछा - तुम्हारी चीज में मेरा कुछ अख्तियार नहीं है?
मातादीन आँखें निकाल कर बोला - नहीं, तुझे कोई अख्तियार नहीं है। काम करती है, खाती है। जो तू चाहे कि खा भी, लुटा भी, तो यह यहाँ न होगा। अगर तुझे यहाँ न परता पड़ता हो,