लेकिन उससे कोई मतलब नहीं। खेत रेहन रख कर दो सौ रुपए लिए हैं। इज्जत-आबरू का निबाह तो करना ही होगा।
कामता ने बाप को निकाल बाहर तो किया, लेकिन अब उसे मालूम होने लगा कि बुड्ढा कितना कामकाजी आदमी था। सबेरे उठ कर सानी-पानी करना, दूध दुहना, फिर दूध ले कर बाजार जाना, वहाँ से आ कर फिर सानी-पानी करना, फिर दूध दुहना, एक पखवारे में उसका हुलिया बिगड़ गया। स्त्री-पुरुष में लड़ाई हुई। स्त्री ने कहा - मैं जान देने के लिए तुम्हारे घर नहीं आई हूँ। मेरी रोटी तुम्हें भारी हो,
लेकिन उससे कोई मतलब नहीं। खेत रेहन रख कर दो सौ रुपए लिए हैं। इज्जत-आबरू का निबाह तो करना ही होगा।
कामता ने बाप को निकाल बाहर तो किया, लेकिन अब उसे मालूम होने लगा कि बुड्ढा कितना कामकाजी आदमी था। सबेरे उठ कर सानी-पानी करना, दूध दुहना, फिर दूध ले कर बाजार जाना, वहाँ से आ कर फिर सानी-पानी करना, फिर दूध दुहना, एक पखवारे में उसका हुलिया बिगड़ गया। स्त्री-पुरुष में लड़ाई हुई। स्त्री ने कहा - मैं जान देने के लिए तुम्हारे घर नहीं आई हूँ। मेरी रोटी तुम्हें भारी हो,