की बातें करके नोहरी उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई घर चली - अब देर हो रही है। कल तुम आ कर रुपए ले लेना महतो!
'चलो, मैं तुम्हें पहुँचा दूँ।'
'नहीं-नहीं, तुम बैठो, मैं चली जाऊँगी।'
'जी तो चाहता है, तुम्हें कंधों पर बैठा कर पहुँचाऊँ।'
नोखेराम की चौपाल गाँव के दूसरे सिरे पर थी, और बाहर-बाहर जाने का रास्ता साफ था। दोनों उसी रास्ते से चले। अब चारों ओर सन्नाटा था।
नोहरी ने कहा - तनिक समझा देते रावत को। क्यों सबसे लड़ाई
की बातें करके नोहरी उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई घर चली - अब देर हो रही है। कल तुम आ कर रुपए ले लेना महतो!
'चलो, मैं तुम्हें पहुँचा दूँ।'
'नहीं-नहीं, तुम बैठो, मैं चली जाऊँगी।'
'जी तो चाहता है, तुम्हें कंधों पर बैठा कर पहुँचाऊँ।'
नोखेराम की चौपाल गाँव के दूसरे सिरे पर थी, और बाहर-बाहर जाने का रास्ता साफ था। दोनों उसी रास्ते से चले। अब चारों ओर सन्नाटा था।
नोहरी ने कहा - तनिक समझा देते रावत को। क्यों सबसे लड़ाई