प्रसन्न है या उदास, इसकी अब उसे बिलकुल चिंता न थी। गोबर क्या कमाता है और कैसे खर्च करता है, इसकी भी उसे परवा न थी। उसका जीवन जो कुछ था, भीतर था, बाहर वह केवल निर्जीव थी।
उसके शोक में भाग ले कर, उसके अंतर्जीवन में पैठ कर, गोबर उसके समीप जा सकता था, उसके जीवन का अंग बन सकता था, पर वह उसके बाह्य जीवन के सूखे तट पर आ कर ही प्यासा लौट जाता था।
एक दिन उसने रूखे स्वर में कहा - तो लल्लू के नाम को कब तक रोए जायगी! चार-पाँच महीने तो हो गए।
प्रसन्न है या उदास, इसकी अब उसे बिलकुल चिंता न थी। गोबर क्या कमाता है और कैसे खर्च करता है, इसकी भी उसे परवा न थी। उसका जीवन जो कुछ था, भीतर था, बाहर वह केवल निर्जीव थी।
उसके शोक में भाग ले कर, उसके अंतर्जीवन में पैठ कर, गोबर उसके समीप जा सकता था, उसके जीवन का अंग बन सकता था, पर वह उसके बाह्य जीवन के सूखे तट पर आ कर ही प्यासा लौट जाता था।
एक दिन उसने रूखे स्वर में कहा - तो लल्लू के नाम को कब तक रोए जायगी! चार-पाँच महीने तो हो गए।