मालती को मेहता जी दोनों हाथों से पकड़े हुए थे, नहीं जरूर कुचल गई होती? तीनों आदमी हाते की दीवार के पास एक इमली के पेड़ के नीचे आ कर रूके। खन्ना एक प्रकार की चेतना-शून्य तन्मयता से मिल की चिमनी की ओर टकटकी लगाए खड़े थे।
मेहता ने पूछा - आपको ज्यादा चोट तो नहीं आई?
खन्ना ने कोई जवाब न दिया। उसी तरफ ताकते रहे। उनकी आँखों में वह शून्यता थी, जो विक्षिप्तता का लक्षण है।
मेहता ने उनका हाथ पकड़ कर फिर पूछा - हम लोग यहाँ व्यर्थ खड़े हैं। मुझे भय होता है,
मालती को मेहता जी दोनों हाथों से पकड़े हुए थे, नहीं जरूर कुचल गई होती? तीनों आदमी हाते की दीवार के पास एक इमली के पेड़ के नीचे आ कर रूके। खन्ना एक प्रकार की चेतना-शून्य तन्मयता से मिल की चिमनी की ओर टकटकी लगाए खड़े थे।
मेहता ने पूछा - आपको ज्यादा चोट तो नहीं आई?
खन्ना ने कोई जवाब न दिया। उसी तरफ ताकते रहे। उनकी आँखों में वह शून्यता थी, जो विक्षिप्तता का लक्षण है।
मेहता ने उनका हाथ पकड़ कर फिर पूछा - हम लोग यहाँ व्यर्थ खड़े हैं। मुझे भय होता है,