मानो साक्षात देवी जी ने घर में पदार्पण किया हो। आज भगवान ने यह दिन दिखाया कि उसका घर गऊ के चरणों से पवित्र हो गया। यह सौभाग्य! न जाने किसके पुण्य-प्रताप से।
धनिया ने भयातुर हो कर कहा - खड़े क्या हो, आँगन में नाँद गाड़ दो।
'आँगन में जगह कहाँ है?'
'बहुत जगह है।'
'मैं तो बाहर ही गाड़ता हूँ'।
'पागल न बनो। गाँव का हाल जान कर भी अनजान बनते हो?'
'अरे, बित्ते-भर के आँगन में गाय कहाँ बाँधोगी भाई?'
'जो बात नहीं जानते,
मानो साक्षात देवी जी ने घर में पदार्पण किया हो। आज भगवान ने यह दिन दिखाया कि उसका घर गऊ के चरणों से पवित्र हो गया। यह सौभाग्य! न जाने किसके पुण्य-प्रताप से।
धनिया ने भयातुर हो कर कहा - खड़े क्या हो, आँगन में नाँद गाड़ दो।
'आँगन में जगह कहाँ है?'
'बहुत जगह है।'
'मैं तो बाहर ही गाड़ता हूँ'।
'पागल न बनो। गाँव का हाल जान कर भी अनजान बनते हो?'
'अरे, बित्ते-भर के आँगन में गाय कहाँ बाँधोगी भाई?'
'जो बात नहीं जानते,