लेकिन बोझा उतारें कैसे? दोनों अपने दिल में कहेंगे, बड़ी जवाँमर्दी दिखाने चले थे। पचास कदम में चीं बोल गए।
लकड़हारे ने चुटकी ली - कहो मालिक, कैसे रंग-ढंग हैं? बहुत हलका है न?
मिर्जा जी को बोझ कुछ हलका मालूम होने लगा। बोले - उतनी दूर तो ले ही जाऊँगा, जितनी दूर तुम लाए हो।
'कई दिन गर्दन दुखेगी मालिक।'
'तुम क्या समझते हो, मैं यों ही फूला हुआ हूँ।'
'नहीं मालिक, अब तो ऐसा नहीं समझता। मुदा आप हैरान न हों, वह चट्टान है, उस पर उतार दीजिए।'
लेकिन बोझा उतारें कैसे? दोनों अपने दिल में कहेंगे, बड़ी जवाँमर्दी दिखाने चले थे। पचास कदम में चीं बोल गए।
लकड़हारे ने चुटकी ली - कहो मालिक, कैसे रंग-ढंग हैं? बहुत हलका है न?
मिर्जा जी को बोझ कुछ हलका मालूम होने लगा। बोले - उतनी दूर तो ले ही जाऊँगा, जितनी दूर तुम लाए हो।
'कई दिन गर्दन दुखेगी मालिक।'
'तुम क्या समझते हो, मैं यों ही फूला हुआ हूँ।'
'नहीं मालिक, अब तो ऐसा नहीं समझता। मुदा आप हैरान न हों, वह चट्टान है, उस पर उतार दीजिए।'