पटेश्वरी ने आगे बढ़ कर दारोगा जी के कान में कहा - तलाशी ले कर क्या करोगे हुजूर, उसका भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाजिर है।
दोनों आदमी जरा अलग जा कर बातें करने लगे।
'कैसा आदमी है?'
'बहुत ही गरीब हुजूर! भोजन का ठिकाना भी नहीं।'
'सच?'
'हाँ, हुजूर, ईमान से कहता हूँ।'
'अरे, तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है?'
'कहाँ की बात हुजूर! दस मिल जायँ, तो हजार समझिए। पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायगा।'
पटेश्वरी ने आगे बढ़ कर दारोगा जी के कान में कहा - तलाशी ले कर क्या करोगे हुजूर, उसका भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाजिर है।
दोनों आदमी जरा अलग जा कर बातें करने लगे।
'कैसा आदमी है?'
'बहुत ही गरीब हुजूर! भोजन का ठिकाना भी नहीं।'
'सच?'
'हाँ, हुजूर, ईमान से कहता हूँ।'
'अरे, तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है?'
'कहाँ की बात हुजूर! दस मिल जायँ, तो हजार समझिए। पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायगा।'