बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है, इसलिए उससे कोई विवाह-संबंधी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था। कोदई की माता को तो उसने ऐसे मीठे शब्दों में और उसके मातृपद की रक्षा करते हुए, ऐसा उपदेश दिया कि उसने प्रसन्न हो कर आशीर्वाद दिया था। तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो। पुत्र माता के रिन से सौ जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता, लाख जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता। करोड़ जनम ले कर भी नहीं...'
बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है, इसलिए उससे कोई विवाह-संबंधी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था। कोदई की माता को तो उसने ऐसे मीठे शब्दों में और उसके मातृपद की रक्षा करते हुए, ऐसा उपदेश दिया कि उसने प्रसन्न हो कर आशीर्वाद दिया था। तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो। पुत्र माता के रिन से सौ जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता, लाख जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता। करोड़ जनम ले कर भी नहीं...'