चीखे, किसी की न सुनते थे। मालिक का यही हुक्म था। उनका क्या बस!
होरी को एक सौ बीस रुपए मिले! उसमें से झिंगुरीसिंह ने अपने पूरे रुपए सूद समेत काट कर कोई पचीस रुपए होरी के हवाले किए।
होरी ने रुपए की ओर उदासीन भाव से देख कर कहा - यह ले कर मैं क्या करूँगा ठाकुर, यह भी तुम्हीं ले लो। मेरी लिए मजूरी बहुत मिलेगी।
झिंगुरी ने पचीसों रुपए जमीन पर फेंक कर कहा - लो या फेंक दो, तुम्हारी खुसी। तुम्हारे कारन मालिक की घुड़कियाँ
चीखे, किसी की न सुनते थे। मालिक का यही हुक्म था। उनका क्या बस!
होरी को एक सौ बीस रुपए मिले! उसमें से झिंगुरीसिंह ने अपने पूरे रुपए सूद समेत काट कर कोई पचीस रुपए होरी के हवाले किए।
होरी ने रुपए की ओर उदासीन भाव से देख कर कहा - यह ले कर मैं क्या करूँगा ठाकुर, यह भी तुम्हीं ले लो। मेरी लिए मजूरी बहुत मिलेगी।
झिंगुरी ने पचीसों रुपए जमीन पर फेंक कर कहा - लो या फेंक दो, तुम्हारी खुसी। तुम्हारे कारन मालिक की घुड़कियाँ