गोबर अविचलित रहा - मैं सच कहता हूँ मालिक! मेरे पास इस समय रुपए होते तो आपसे इनकार करता?
'दो रुपए भी नहीं दे सकते?'
'इस समय तो नहीं हैं।'
मेरी अंगूठी गिरो रख लो।'
गोबर का मन ललचा उठा, मगर बात कैसे बदले?
बोला - यह आप क्या कहते हैं मालिक, रुपए होते तो आपको दे देता, अंगूठी की कौन बात थी।
मिर्जा ने अपने स्वर में बड़ा दीन आग्रह भर कर कहा - मैं फिर तुमसे कभी न माँगूँगा गोबर! मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है। इस शराब
गोबर अविचलित रहा - मैं सच कहता हूँ मालिक! मेरे पास इस समय रुपए होते तो आपसे इनकार करता?
'दो रुपए भी नहीं दे सकते?'
'इस समय तो नहीं हैं।'
मेरी अंगूठी गिरो रख लो।'
गोबर का मन ललचा उठा, मगर बात कैसे बदले?
बोला - यह आप क्या कहते हैं मालिक, रुपए होते तो आपको दे देता, अंगूठी की कौन बात थी।
मिर्जा ने अपने स्वर में बड़ा दीन आग्रह भर कर कहा - मैं फिर तुमसे कभी न माँगूँगा गोबर! मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है। इस शराब