प्रतिज्ञा - Pratigya

जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से मारी गई। कमलाप्रसाद तो नाराज हो ही गया था, सुमित्रा ने भी मुँह फुला लिया। पूर्णा ने कई बार इधर-उधर की बातें करके उसका मन बहलाने की चेष्टा की; पर जब सुमित्रा की त्योरियाँ बदल गईं; और उसने झिड़क कर कह दिया - इस वक्त मुझसे कुछ न कहो पूर्णा, मुझे कोई बात नहीं सुहाती। मैं जन्म से ही अभागिनी हूँ, नहीं तो इस घर में आती ही क्यों? तुम आती ही क्यों! तुम आईं,


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जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से मारी गई। कमलाप्रसाद तो नाराज हो ही गया था, सुमित्रा ने भी मुँह फुला लिया। पूर्णा ने कई बार इधर-उधर की बातें करके उसका मन बहलाने की चेष्टा की; पर जब सुमित्रा की त्योरियाँ बदल गईं; और उसने झिड़क कर कह दिया - इस वक्त मुझसे कुछ न कहो पूर्णा, मुझे कोई बात नहीं सुहाती। मैं जन्म से ही अभागिनी हूँ, नहीं तो इस घर में आती ही क्यों? तुम आती ही क्यों! तुम आईं,


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