प्रतिज्ञा - Pratigya

आज तुमसे प्रेम की भिक्षा क्यों माँगता होता? मुझे तो यह दैव की स्पष्ट प्रेरणा मालूम हो रही है।'

कमलाप्रसाद उसे फर्श पर बैठते देख कर उठा और उसका हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने की चेष्टा करते हुए बोला - 'नहीं-नहीं पूर्णा, यह नहीं, हो सकता। फिर मैं भी जमीन पर बैठूँगा। आखिर इस कुर्सी पर बैठने में तुम्हें क्या आपत्ति है?'

कमलाप्रसाद का चेहरा खिल उठा, बोला - 'अगर कोई कुछ कहे, तो उसकी मूर्खता है। सुमित्रा को यहाँ बैठे देख कर कोई कुछ न कहेगा,


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आज तुमसे प्रेम की भिक्षा क्यों माँगता होता? मुझे तो यह दैव की स्पष्ट प्रेरणा मालूम हो रही है।'

कमलाप्रसाद उसे फर्श पर बैठते देख कर उठा और उसका हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने की चेष्टा करते हुए बोला - 'नहीं-नहीं पूर्णा, यह नहीं, हो सकता। फिर मैं भी जमीन पर बैठूँगा। आखिर इस कुर्सी पर बैठने में तुम्हें क्या आपत्ति है?'

कमलाप्रसाद का चेहरा खिल उठा, बोला - 'अगर कोई कुछ कहे, तो उसकी मूर्खता है। सुमित्रा को यहाँ बैठे देख कर कोई कुछ न कहेगा,


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