प्रतिज्ञा - Pratigya

न जाने कैसे खर्च कर डालता है। इतने रूपयों की गड्डी को हाथों से स्पर्श करने का आनंद उसे कभी न मिला था। दाननाथ में या तो इतनी सूझ नहीं थी, या तो लापरवाह थे। प्रेमा ने दो ही चार महीने में घर को सुव्यवस्थित कर दिया। अब हरेक काम का समय और नियम था, हरेक चीज का विशेष स्थान था, आमदनी और खर्च का हिसाब था। दाननाथ को अब दस बजे सोना और पाँच बजे उठना पड़ता था, नौकर-चाकर खुश थे और सबसे ज्यादा खुश थी प्रेमा की सास। दाननाथ को जेब खर्च


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न जाने कैसे खर्च कर डालता है। इतने रूपयों की गड्डी को हाथों से स्पर्श करने का आनंद उसे कभी न मिला था। दाननाथ में या तो इतनी सूझ नहीं थी, या तो लापरवाह थे। प्रेमा ने दो ही चार महीने में घर को सुव्यवस्थित कर दिया। अब हरेक काम का समय और नियम था, हरेक चीज का विशेष स्थान था, आमदनी और खर्च का हिसाब था। दाननाथ को अब दस बजे सोना और पाँच बजे उठना पड़ता था, नौकर-चाकर खुश थे और सबसे ज्यादा खुश थी प्रेमा की सास। दाननाथ को जेब खर्च


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