प्रतिज्ञा - Pratigya

से निकलने वाली बात का कोई महत्व ही नहीं? जरा सोचो। आदमी जीवन में सुख ही तो चाहता है या और कुछ? फिर जिस प्राणी के साथ उसका जीवन सुखमय हो रहा है, उसे वह कैसे छोड़ सकता है, उसके साथ कैसे निठुरता या कपट कर सकता है?'

कमलाप्रसाद ने मुस्करा कर कहा - 'नहीं, तुम भला नादान हो सकती हो, राम-राम! तुम वेद-शास्त्र सभी घोटे बैठी हो। अच्छा बताओ, विवाह कै प्रकार के होते हैं?'

'बड़ी बुद्धिमती हो, तो इसका मतलब समझो?'

कमलाप्रसाद ने


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से निकलने वाली बात का कोई महत्व ही नहीं? जरा सोचो। आदमी जीवन में सुख ही तो चाहता है या और कुछ? फिर जिस प्राणी के साथ उसका जीवन सुखमय हो रहा है, उसे वह कैसे छोड़ सकता है, उसके साथ कैसे निठुरता या कपट कर सकता है?'

कमलाप्रसाद ने मुस्करा कर कहा - 'नहीं, तुम भला नादान हो सकती हो, राम-राम! तुम वेद-शास्त्र सभी घोटे बैठी हो। अच्छा बताओ, विवाह कै प्रकार के होते हैं?'

'बड़ी बुद्धिमती हो, तो इसका मतलब समझो?'

कमलाप्रसाद ने


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