'कुछ नहीं, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को वचन देते हैं, बस विवाह हो जाता है। माता-पिता, भाई-बंधु, पंडित-पुरोहित किसी का काम नहीं। हाँ, वर और कन्या दोनों ही का बालिग हो जाना जरूरी है।'
कमलाप्रसाद ने प्रतिवाद किया - 'मेरी समझ में तो जिसे तुम विवाह समझ रही हो, वही लड़कों का खेल है। ढोल-मजीरा बजा, आतिशबाजियाँ छूटीं और दो अबोध बालक, जो विवाह का मर्म तक नहीं समझते, एक-दूसरे के गले जीवन-पर्यंत के लिए मढ़ दिए गए। सच पूछो तो यही लड़कों का खेल है।'
'कुछ नहीं, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को वचन देते हैं, बस विवाह हो जाता है। माता-पिता, भाई-बंधु, पंडित-पुरोहित किसी का काम नहीं। हाँ, वर और कन्या दोनों ही का बालिग हो जाना जरूरी है।'
कमलाप्रसाद ने प्रतिवाद किया - 'मेरी समझ में तो जिसे तुम विवाह समझ रही हो, वही लड़कों का खेल है। ढोल-मजीरा बजा, आतिशबाजियाँ छूटीं और दो अबोध बालक, जो विवाह का मर्म तक नहीं समझते, एक-दूसरे के गले जीवन-पर्यंत के लिए मढ़ दिए गए। सच पूछो तो यही लड़कों का खेल है।'