प्रतिज्ञा - Pratigya

समय तुम्हारा चुप रह जाना ही अच्छा है। कुछ दिनों तक लोग तुम्हें बदनाम करेंगे, पर अंत में तुम्हारा आदर करेंगे। मुझे भी यही शंका है कि यदि तुमने भैया जी का विरोध किया तो पिता जी को बड़ा दुःख होगा।'

प्रेमा ने प्रेम-कृतज्ञ नेत्रों से देखा। कंठ गद्गद् हो गया। मुँह से एक शब्द न निकला। पति के महान त्याग ने उसे विभोर कर दिया। उसके एक इशारे पर अपमान, निंदा, अनादर सहने के लिए तैयार हो कर दाननाथ ने आज उसके हृदय पर अधिकार पा लिया। वह मुँह से कुछ न बोली,


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समय तुम्हारा चुप रह जाना ही अच्छा है। कुछ दिनों तक लोग तुम्हें बदनाम करेंगे, पर अंत में तुम्हारा आदर करेंगे। मुझे भी यही शंका है कि यदि तुमने भैया जी का विरोध किया तो पिता जी को बड़ा दुःख होगा।'

प्रेमा ने प्रेम-कृतज्ञ नेत्रों से देखा। कंठ गद्गद् हो गया। मुँह से एक शब्द न निकला। पति के महान त्याग ने उसे विभोर कर दिया। उसके एक इशारे पर अपमान, निंदा, अनादर सहने के लिए तैयार हो कर दाननाथ ने आज उसके हृदय पर अधिकार पा लिया। वह मुँह से कुछ न बोली,


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