प्रतिज्ञा - Pratigya

को चीजें दिखा रही थीं। यहाँ की रोजाना बिक्री सौ रुपए के लगभग थीं। मालूम हुआ कि संध्या समय ग्राहक अधिक आते हैं।

दाननाथ ने पूछा - 'इतनी सुदक्ष स्त्रियाँ तुम्हें कहाँ मिल गईं?'

बगीचा बहुत बड़ा न था। आम, अमरूद, लीची आदि की कलमें लगाई जा रही थीं। हाँ, फूलों के पौधे तैयार हो गए थे। बीच में एक हौज था और तीन-चार छोटी-छोटी लड़कियाँ हौज से पानी निकाल-निकाल कर क्यारियों में डाल रही थीं। हौज तक आने के लिए चारों ओर रविशें बनी


296 of 305

को चीजें दिखा रही थीं। यहाँ की रोजाना बिक्री सौ रुपए के लगभग थीं। मालूम हुआ कि संध्या समय ग्राहक अधिक आते हैं।

दाननाथ ने पूछा - 'इतनी सुदक्ष स्त्रियाँ तुम्हें कहाँ मिल गईं?'

बगीचा बहुत बड़ा न था। आम, अमरूद, लीची आदि की कलमें लगाई जा रही थीं। हाँ, फूलों के पौधे तैयार हो गए थे। बीच में एक हौज था और तीन-चार छोटी-छोटी लड़कियाँ हौज से पानी निकाल-निकाल कर क्यारियों में डाल रही थीं। हौज तक आने के लिए चारों ओर रविशें बनी


296 of 305