प्रतिज्ञा - Pratigya



घर जा कर अमृतराय ने रसोइए को खूब डाँटा - 'तुमने क्यों इत्तला की कि भोजन तैयार है?'

बात ठीक थी। अमृतराय रसोइए को कई बार मना कर चुके थे कि मैं जब किसी के साथ रहा करूँ, तो सिर पर मत सवार हो जाया करो। रसोइए का कोई दोष न था। बेचारे बहुत झेंपे। भोजन आया। दोनों मित्रों ने खाना शुरू किया। भोजन निरामिष था, पर बहुत ही स्वादिष्ट।

अमृतराय - 'क्यों भाई?'

अमृतराय - 'जी नहीं, मैं तो उन ब्रह्माचारियों में नहीं हूँ। पुष्टिकारक


300 of 305



घर जा कर अमृतराय ने रसोइए को खूब डाँटा - 'तुमने क्यों इत्तला की कि भोजन तैयार है?'

बात ठीक थी। अमृतराय रसोइए को कई बार मना कर चुके थे कि मैं जब किसी के साथ रहा करूँ, तो सिर पर मत सवार हो जाया करो। रसोइए का कोई दोष न था। बेचारे बहुत झेंपे। भोजन आया। दोनों मित्रों ने खाना शुरू किया। भोजन निरामिष था, पर बहुत ही स्वादिष्ट।

अमृतराय - 'क्यों भाई?'

अमृतराय - 'जी नहीं, मैं तो उन ब्रह्माचारियों में नहीं हूँ। पुष्टिकारक


300 of 305