प्रतिज्ञा - Pratigya

पर वह क्या जानती थी कि वह उसे उबारने वाली नौका नहीं वरन एक विचित्र जल-जंतु है, जो उसकी आत्मा को निगल जाएगा?


अध्याय 5

पूर्णा को अपने घर से निकलते समय बड़ा दुःख होने लगा। जीवन के तीन वर्ष इसी घर में काटे थे। यहीं सौभाग्य के सुख देखे, यहीं वैधव्य के दुःख भी देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदय फट जाता था। जिस समय चारों कहार उसका असबाब उठाने के लिए घर आए, वह सहसा रो पड़ी। उसके मन में कुछ वैसे ही भाव जाग्रत हो गए, जैसे शव को उठाते


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पर वह क्या जानती थी कि वह उसे उबारने वाली नौका नहीं वरन एक विचित्र जल-जंतु है, जो उसकी आत्मा को निगल जाएगा?


अध्याय 5

पूर्णा को अपने घर से निकलते समय बड़ा दुःख होने लगा। जीवन के तीन वर्ष इसी घर में काटे थे। यहीं सौभाग्य के सुख देखे, यहीं वैधव्य के दुःख भी देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदय फट जाता था। जिस समय चारों कहार उसका असबाब उठाने के लिए घर आए, वह सहसा रो पड़ी। उसके मन में कुछ वैसे ही भाव जाग्रत हो गए, जैसे शव को उठाते


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