तक देवकी पूर्णा को आदर्श गृहिणी कह कर बखान करती रहती थी। उसको दिखा कर सुमित्रा को लज्जित करना चाहती थी। इसलिए सुमित्रा पूर्णा से जलती थी। आज देवकी के मन में वह भाव न था, इसलिए सुमित्रा के मन में भी वह भाव न रहा।
ग्यारह बजे थे। पूर्णा प्रकाश में आँखें हटा कर खिड़की के बाहर अंधकार की ओर देख रही थी। उस गहरे अँधेरे में उसे कितने सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे थे - वही अपना खपरैल का घर था, वही पुरानी खाट थी, वही छोटा-सा आँगन था,
तक देवकी पूर्णा को आदर्श गृहिणी कह कर बखान करती रहती थी। उसको दिखा कर सुमित्रा को लज्जित करना चाहती थी। इसलिए सुमित्रा पूर्णा से जलती थी। आज देवकी के मन में वह भाव न था, इसलिए सुमित्रा के मन में भी वह भाव न रहा।
ग्यारह बजे थे। पूर्णा प्रकाश में आँखें हटा कर खिड़की के बाहर अंधकार की ओर देख रही थी। उस गहरे अँधेरे में उसे कितने सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे थे - वही अपना खपरैल का घर था, वही पुरानी खाट थी, वही छोटा-सा आँगन था,