अमृतराय चौंक पड़े। वह मुख पीतवर्ण हो रहा था। आठ-दस दिन पहले जो कांति थी, उसका कहीं नाम तक न था। घबरा कर कहा - 'यह तुम्हारी क्या दशा है? कहीं लू तो नहीं लग गई? कैसी तबीयत है?'
दाननाथ हँस पड़े, पर अमृतराय को हँसी नहीं आई। गंभीर स्वर में बोले - 'सारी दुनिया के सिद्धांत चाटे बैठे हो, अभी स्वास्थ्य-रक्षा पर बोलना पड़े तो इस विषय के पंडितों को भी लज्जित कर दोगे, पर इतना नहीं हो सकता कि शाम को सैर ही कर लिया करो।'
इन उच्छृंखल शब्दों में विनोद के साथ कितनी आत्मीयता,
अमृतराय चौंक पड़े। वह मुख पीतवर्ण हो रहा था। आठ-दस दिन पहले जो कांति थी, उसका कहीं नाम तक न था। घबरा कर कहा - 'यह तुम्हारी क्या दशा है? कहीं लू तो नहीं लग गई? कैसी तबीयत है?'
दाननाथ हँस पड़े, पर अमृतराय को हँसी नहीं आई। गंभीर स्वर में बोले - 'सारी दुनिया के सिद्धांत चाटे बैठे हो, अभी स्वास्थ्य-रक्षा पर बोलना पड़े तो इस विषय के पंडितों को भी लज्जित कर दोगे, पर इतना नहीं हो सकता कि शाम को सैर ही कर लिया करो।'
इन उच्छृंखल शब्दों में विनोद के साथ कितनी आत्मीयता,