प्रतिज्ञा - Pratigya

छोड़-छाड़ दिया। बहुत पढ़ने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जब आँखें कमजोर हो जाती हैं, तो बुद्धि कैसे बची रह सकती है? तो कोई विधवा भी ठीक हो गई कि नहीं? कहाँ हैं मिसराइन, कह दो अब तुम्हारी चाँदी है, कल ही संदेशा भेज दें। कोई और न जाए तो मैं जाने को तैयार हूँ। बड़ा मजा रहेगा। कहाँ हैं मिसरानी, अब उनके भाग्य चमके। रहेगी बिरादरी ही की विधवा न? कि बिरादरी की भी कैद नहीं रही?'

कमलाप्रसाद - 'यह सभावाले जो कुछ न करें, वह थोड़ा।


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छोड़-छाड़ दिया। बहुत पढ़ने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जब आँखें कमजोर हो जाती हैं, तो बुद्धि कैसे बची रह सकती है? तो कोई विधवा भी ठीक हो गई कि नहीं? कहाँ हैं मिसराइन, कह दो अब तुम्हारी चाँदी है, कल ही संदेशा भेज दें। कोई और न जाए तो मैं जाने को तैयार हूँ। बड़ा मजा रहेगा। कहाँ हैं मिसरानी, अब उनके भाग्य चमके। रहेगी बिरादरी ही की विधवा न? कि बिरादरी की भी कैद नहीं रही?'

कमलाप्रसाद - 'यह सभावाले जो कुछ न करें, वह थोड़ा।


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