1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

भयंकरता का अघोर पाप-उसके अधिकारी अन्याय के सिर पर वज्राघात जैसा पड़नेवाला है।

और यदि विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध का डर नहीं होता तो आज अत्याचार और अन्याय के अप्रतिहत भयंकर तांडव से यह वसुंधरा थर्राती रहती। जल्दी या देर से, परंतु ऐसे क्षणिक विजयी अन्याय का प्रतिशोध न्यायी प्रकृति लेगी ही, इस चिंता से यदि अत्याचारी की नींद सुरक्षित होती तो अकुतो भयता से आज सब ओर चोरी-चोरी का खुला राज होता। पर हर हिरण्यकशिपु को नृसिंह का प्रतिशोध,


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भयंकरता का अघोर पाप-उसके अधिकारी अन्याय के सिर पर वज्राघात जैसा पड़नेवाला है।

और यदि विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध का डर नहीं होता तो आज अत्याचार और अन्याय के अप्रतिहत भयंकर तांडव से यह वसुंधरा थर्राती रहती। जल्दी या देर से, परंतु ऐसे क्षणिक विजयी अन्याय का प्रतिशोध न्यायी प्रकृति लेगी ही, इस चिंता से यदि अत्याचारी की नींद सुरक्षित होती तो अकुतो भयता से आज सब ओर चोरी-चोरी का खुला राज होता। पर हर हिरण्यकशिपु को नृसिंह का प्रतिशोध,


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