अपनी तलवारें निकालीं और अपने अंगे्रज शत्रु पर प्राणपण से टूट पड़े। अपना अंतिम सैनिक अपने-अपने स्थान पर लड़ाई लड़ते मरने तक उन्होंने ईदगाह भवन में शत्रु को प्रवेश नहीं करने दिया।’’
18 जून को नसीराबाद के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए और अपने साथ
1857 का स्वातंत्र्य समर - 241
लाया हुआ खजाना उन्होंने शाही प्रतिनिधि को दे दिया। उनके प्रतिनिधियों का बादशाह ने अपने राजमहल में स्वागत किया और उनका यथायोग्य
अपनी तलवारें निकालीं और अपने अंगे्रज शत्रु पर प्राणपण से टूट पड़े। अपना अंतिम सैनिक अपने-अपने स्थान पर लड़ाई लड़ते मरने तक उन्होंने ईदगाह भवन में शत्रु को प्रवेश नहीं करने दिया।’’
18 जून को नसीराबाद के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए और अपने साथ
1857 का स्वातंत्र्य समर - 241
लाया हुआ खजाना उन्होंने शाही प्रतिनिधि को दे दिया। उनके प्रतिनिधियों का बादशाह ने अपने राजमहल में स्वागत किया और उनका यथायोग्य