1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

में लिया काम पूरा किए बिना झूठा संतोष मानकर चुप बैठनेवाला जनरल हैवलाॅक नहीं था। समाप्ति के सिवाय समापन नहीं, यह उसकी टेक थी। उसने उपर्युक्त प्रोत्साहन देकर आगे कहा, ‘‘तुम्हारे लोग लखनऊ में संकटग्रस्त हैं। आगरे में घेरा लगा है। विद्रोही क्रांति के हाथों में दिल्ली अभी भी फंसी है। तुम्हें सफलता पानी है तो तुम्हें स्वार्थ-त्याग ही करना पड़ेगा। तीन नगर संभालने हैं, दो बंधन


1857 का स्वातंत्र्य समर - 256


1228 of 2102

में लिया काम पूरा किए बिना झूठा संतोष मानकर चुप बैठनेवाला जनरल हैवलाॅक नहीं था। समाप्ति के सिवाय समापन नहीं, यह उसकी टेक थी। उसने उपर्युक्त प्रोत्साहन देकर आगे कहा, ‘‘तुम्हारे लोग लखनऊ में संकटग्रस्त हैं। आगरे में घेरा लगा है। विद्रोही क्रांति के हाथों में दिल्ली अभी भी फंसी है। तुम्हें सफलता पानी है तो तुम्हें स्वार्थ-त्याग ही करना पड़ेगा। तीन नगर संभालने हैं, दो बंधन


1857 का स्वातंत्र्य समर - 256


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