फिर एक बार जूझना होगा
कानपुर में पराजित हो जाने के बाद नाना साहब पेशवा ब्रह्यवर्त से खजाना, शस्त्रास्त्र और सेना लेकर गंगा पार हो गए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वे क्रांतिवीर केवल स्वधर्म और स्वराज्य के लिए ही कैसे लड़ रहे थे, यह सिद्ध करने के लिए उसी समय उस प्रदेश में उस काल के युद्ध जिन्होंने अपनी आंखों से देखें, वसई महाराष्ट्र के उन्हीं वेदशास्त्र-संपन्न विष्णुभट गोडसे ने अपने यात्रावृŸा
फिर एक बार जूझना होगा
कानपुर में पराजित हो जाने के बाद नाना साहब पेशवा ब्रह्यवर्त से खजाना, शस्त्रास्त्र और सेना लेकर गंगा पार हो गए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वे क्रांतिवीर केवल स्वधर्म और स्वराज्य के लिए ही कैसे लड़ रहे थे, यह सिद्ध करने के लिए उसी समय उस प्रदेश में उस काल के युद्ध जिन्होंने अपनी आंखों से देखें, वसई महाराष्ट्र के उन्हीं वेदशास्त्र-संपन्न विष्णुभट गोडसे ने अपने यात्रावृŸा