अर्थ में और प्रमुखता से बलाबल की वास्तविक लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी, ऐसा दिखेगा। ‘दिल्ली का घेरा’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक का लेखक कहता है-‘‘हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस नेटिव थे । जितने यूरोपियन तोपखाने पर होते उससे चैगुने नेटिव लोग और घोड़े के पीछे दो नेटिव घुड़सवार थे। नेटिवों की भरती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं।’’ देश के एक भाग की चेतना देश के दूसरे भाग की अचेतनता ने मार गिराई। ऐसी
अर्थ में और प्रमुखता से बलाबल की वास्तविक लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी, ऐसा दिखेगा। ‘दिल्ली का घेरा’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक का लेखक कहता है-‘‘हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस नेटिव थे । जितने यूरोपियन तोपखाने पर होते उससे चैगुने नेटिव लोग और घोड़े के पीछे दो नेटिव घुड़सवार थे। नेटिवों की भरती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं।’’ देश के एक भाग की चेतना देश के दूसरे भाग की अचेतनता ने मार गिराई। ऐसी