बनाने में जुट जाता है। इस जल्दी में न्याय-अन्याय का विचार शुरू हो जाता है तो उसी समय डाकूगिरी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही वस्तुस्थिति होने से अंगे्रजों के हिंदुस्थान पर डाले गए भयंकर डाकों में अंगे्रजों के शासन में उस षासन को स्थिरता देनेवाले और उस डकैती को बढ़ानेवाले उनके कृत्य न्यायसंगत थे या अन्यायी, यह निश्चित करने के लिए घिस-घिस करना इतिहास की व्यर्थ खींचतान करना है। संधिपत्र, वचन, दोस्ती आदि शब्दों का डाकेजनी के शास्त्र में स्थान नहीं होता,
बनाने में जुट जाता है। इस जल्दी में न्याय-अन्याय का विचार शुरू हो जाता है तो उसी समय डाकूगिरी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही वस्तुस्थिति होने से अंगे्रजों के हिंदुस्थान पर डाले गए भयंकर डाकों में अंगे्रजों के शासन में उस षासन को स्थिरता देनेवाले और उस डकैती को बढ़ानेवाले उनके कृत्य न्यायसंगत थे या अन्यायी, यह निश्चित करने के लिए घिस-घिस करना इतिहास की व्यर्थ खींचतान करना है। संधिपत्र, वचन, दोस्ती आदि शब्दों का डाकेजनी के शास्त्र में स्थान नहीं होता,