हैं। विषवृक्ष का वास्तविक नाश उसकी शाखाएं और पत्तियां तोड़ते रहने से नहीं हो सकता-वह तो तब होगा जब उन शाखाओं और पत्तों को बार-बार आगे धकेलती हुई और उनका पोषण करती हुई उस वृक्ष की जड़ें खोदकर उनका सर्वनाश किया जाए।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 62
डलहौजी किसी परिस्थिति का परिणाम है। वह परिस्थिति जब तक बनी हुई है तब तक बनी हुई है तब तक एक डलहौजी जाए तो उसकी जगह दस डलहौजी आएंगे। परंतु यह सिद्धांत भूलकर
हैं। विषवृक्ष का वास्तविक नाश उसकी शाखाएं और पत्तियां तोड़ते रहने से नहीं हो सकता-वह तो तब होगा जब उन शाखाओं और पत्तों को बार-बार आगे धकेलती हुई और उनका पोषण करती हुई उस वृक्ष की जड़ें खोदकर उनका सर्वनाश किया जाए।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 62
डलहौजी किसी परिस्थिति का परिणाम है। वह परिस्थिति जब तक बनी हुई है तब तक बनी हुई है तब तक एक डलहौजी जाए तो उसकी जगह दस डलहौजी आएंगे। परंतु यह सिद्धांत भूलकर