गुलामी की शाखाएं न तोड़ते हुए उस हलाहल भरे कंटीले वृक्ष को समूल उखाड़े बिना, संक्षेप में यह कि स्वराज्य की यह औषधि संग्राम भूमि के अतिरिक्त कहीं और नहीं मिलती। यह वास्तविकता सत्य उनकी कुशाग्र बुद्धि को ज्ञात होते ही एक क्षण भी न रूकते हुए वे अपने प्राण अपने हाथों में और तलवार शत्रु की गरदन पर रखने रण-मैदान में कूद पड़े।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 63
सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की पवित्रता और महानता इसी
गुलामी की शाखाएं न तोड़ते हुए उस हलाहल भरे कंटीले वृक्ष को समूल उखाड़े बिना, संक्षेप में यह कि स्वराज्य की यह औषधि संग्राम भूमि के अतिरिक्त कहीं और नहीं मिलती। यह वास्तविकता सत्य उनकी कुशाग्र बुद्धि को ज्ञात होते ही एक क्षण भी न रूकते हुए वे अपने प्राण अपने हाथों में और तलवार शत्रु की गरदन पर रखने रण-मैदान में कूद पड़े।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 63
सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की पवित्रता और महानता इसी