1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

हड़बड़ाकर जाग उठा। उसकी उस भव्य और आदरणीय मूर्ति के सामने फिरंगियों के रक्त से सनी तलवार चलाते हुए सिपाहियों के नेता ने कहा, ‘‘खाविंद! मेरठ में अंगे्रजों की पराजय हो चुकी है, दिल्ली अपने हाथ में है और पेशावर से कलकŸाा तक के सारे सिपाही आपके आदेश की राह देख रहे हैं। अंगे्रजों की गुलामी की बेड़ियां तोड़कर अपनी प्रकृतिदŸा स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सारा हिंदुस्थान जाग उठा है। ऐसे समय में यह स्वतंत्रता का निशान अपने हाथ में लें,


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हड़बड़ाकर जाग उठा। उसकी उस भव्य और आदरणीय मूर्ति के सामने फिरंगियों के रक्त से सनी तलवार चलाते हुए सिपाहियों के नेता ने कहा, ‘‘खाविंद! मेरठ में अंगे्रजों की पराजय हो चुकी है, दिल्ली अपने हाथ में है और पेशावर से कलकŸाा तक के सारे सिपाही आपके आदेश की राह देख रहे हैं। अंगे्रजों की गुलामी की बेड़ियां तोड़कर अपनी प्रकृतिदŸा स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सारा हिंदुस्थान जाग उठा है। ऐसे समय में यह स्वतंत्रता का निशान अपने हाथ में लें,


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