के सामने शाहजहां और अकबर की मूर्तियां आने-जाने लगीं और अब गुलामी में रहने की अपेक्षा स्वदेश को स्वतंत्र करते-करते मरना ही अधिक श्रेयस्कर है, ऐसी दैवी स्फूर्ति उसके हृदय में संचरित होने लगी। आगे बादशाह ने कहा, ‘‘मेरे पास खजाना नहीं है और तुम्हें वेतन भी नहीं मिलेगा।’’ तब वे सिपाही बोले, ‘‘हम अंगे्रजों का खजाना लूटेंगे और आपके खजाने में भरेंगे’’ ‘‘तो फिर आपका नेतृत्व मैं स्वीकार करता हूं।’’ ऐसा अभिवचन
के सामने शाहजहां और अकबर की मूर्तियां आने-जाने लगीं और अब गुलामी में रहने की अपेक्षा स्वदेश को स्वतंत्र करते-करते मरना ही अधिक श्रेयस्कर है, ऐसी दैवी स्फूर्ति उसके हृदय में संचरित होने लगी। आगे बादशाह ने कहा, ‘‘मेरे पास खजाना नहीं है और तुम्हें वेतन भी नहीं मिलेगा।’’ तब वे सिपाही बोले, ‘‘हम अंगे्रजों का खजाना लूटेंगे और आपके खजाने में भरेंगे’’ ‘‘तो फिर आपका नेतृत्व मैं स्वीकार करता हूं।’’ ऐसा अभिवचन