भारत में भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई। बड़ी संख्या में उन्हें अंडमान टापू भेज दिया गया। इस आघात से थोड़ा संभलते ही मैडम कामा, लाला हरदयाल एवं वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय आदि क्रांतिकारियों ने ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ का अंग्रेजी में दूसरा संस्करण प्रकाशित किया। पहला संस्करण तो निःशुल्क वितरित किया गया था। किंतु इस संस्करण का मूल्य रखा गया, ताकि क्रांतिकारी दल को थोड़ा-बहुत आर्थिक सहारा मिल सके।
भारत में भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई। बड़ी संख्या में उन्हें अंडमान टापू भेज दिया गया। इस आघात से थोड़ा संभलते ही मैडम कामा, लाला हरदयाल एवं वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय आदि क्रांतिकारियों ने ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ का अंग्रेजी में दूसरा संस्करण प्रकाशित किया। पहला संस्करण तो निःशुल्क वितरित किया गया था। किंतु इस संस्करण का मूल्य रखा गया, ताकि क्रांतिकारी दल को थोड़ा-बहुत आर्थिक सहारा मिल सके।