और फिरंगियों की ओर से नहीं लडेंगे। ऐसे में किस बात पर विश्वास किया जाए, यह अंगे्रजों की समझ मंे नही आ रहा था। इस तरह 29 मई ही नहीं, 30 मई भी निकल गई और उस दिन तो सिपाहियों का आचरण इतना राजनिष्ठ हो गया था कि वैसा शायद कभी नहीं था। ऐसे में सैनिक-असैनिक-सारे अंगे्रज अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि संकट टल गया है और अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
31 मई उदित हुई। उस दिन कैप्टन ब्राउन लो के घर को एकाएक
और फिरंगियों की ओर से नहीं लडेंगे। ऐसे में किस बात पर विश्वास किया जाए, यह अंगे्रजों की समझ मंे नही आ रहा था। इस तरह 29 मई ही नहीं, 30 मई भी निकल गई और उस दिन तो सिपाहियों का आचरण इतना राजनिष्ठ हो गया था कि वैसा शायद कभी नहीं था। ऐसे में सैनिक-असैनिक-सारे अंगे्रज अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि संकट टल गया है और अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
31 मई उदित हुई। उस दिन कैप्टन ब्राउन लो के घर को एकाएक