1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

सेना तैयार करते और जो अति बुढ़ापे के कारण कुछ भी प्रत्यक्ष कृति करने में असमर्थ थे, अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े लड़ाई के दांव-घात समझाते और संकट की बातों पर सलाह देते। पेंशनभोगी सिपाहियों को भी जिस उद्देश्य से बुढ़ापे में यौवन की उमंग आने लगती है उस स्वराज्य और स्वधर्म की दिव्य चेतना की हवा अन्यत्र भी लोगों में भर गई थी, इसमें कोई शंका नहीं। दुकानदार, मारवाड़ी, बनिया इनको भी उस लोक-क्षोभ से इतना साहस भर गया


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सेना तैयार करते और जो अति बुढ़ापे के कारण कुछ भी प्रत्यक्ष कृति करने में असमर्थ थे, अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े लड़ाई के दांव-घात समझाते और संकट की बातों पर सलाह देते। पेंशनभोगी सिपाहियों को भी जिस उद्देश्य से बुढ़ापे में यौवन की उमंग आने लगती है उस स्वराज्य और स्वधर्म की दिव्य चेतना की हवा अन्यत्र भी लोगों में भर गई थी, इसमें कोई शंका नहीं। दुकानदार, मारवाड़ी, बनिया इनको भी उस लोक-क्षोभ से इतना साहस भर गया


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