आदि सारा हिंदुस्थान अभी तक मृत-सा निश्चल पड़ा था, जब उसमें से कुछ भाग चैतन्य हुआ तो वह पिशाच बनकर विद्रोहियों पर ही टूट पड़ा। इलाहाबाद और बनारस में अंगे्रजों के साथ हजारों सिख सिपाही थे ही। फिर क्यों घबड़ाया जाए! दूसरे कुछ भी करें, पर इलाहाबाद के पंडों और मुल्लाओं ने, तालूकदार और किसानों ने, छात्रों और शिक्षकों ने दुकानदारों और ग्राहकों ने अनंत बाधाएं सामने खड़ी होते हुए भी सबको एक छाने के
1857 का स्वातंत्र्य समर - 172
आदि सारा हिंदुस्थान अभी तक मृत-सा निश्चल पड़ा था, जब उसमें से कुछ भाग चैतन्य हुआ तो वह पिशाच बनकर विद्रोहियों पर ही टूट पड़ा। इलाहाबाद और बनारस में अंगे्रजों के साथ हजारों सिख सिपाही थे ही। फिर क्यों घबड़ाया जाए! दूसरे कुछ भी करें, पर इलाहाबाद के पंडों और मुल्लाओं ने, तालूकदार और किसानों ने, छात्रों और शिक्षकों ने दुकानदारों और ग्राहकों ने अनंत बाधाएं सामने खड़ी होते हुए भी सबको एक छाने के
1857 का स्वातंत्र्य समर - 172