और पुत्रियों को-जिनकी संख्या भी न गिनी जा सके-जिंदा जला दिया। परमेश्वर और मनुष्य जाति के सामने मैं यह कथन कर रहा हूं। इसमें का एक अक्षर भी मिटाने की किसी में हिम्मत है तो वह सामने आकर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 173
एक क्षण के लिए तो खड़ा रहे। इन सबका अपराध क्या था? तो वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सारे कष्ट भोगने को तैयार हो गए थे। फिर भी, अभी कानपुर का कत्लेआम नहीं हुआ था। कानपुर के कत्लेआम के प्रतिशोध में नील ने यह कत्लेआम नहीं किया था,
और पुत्रियों को-जिनकी संख्या भी न गिनी जा सके-जिंदा जला दिया। परमेश्वर और मनुष्य जाति के सामने मैं यह कथन कर रहा हूं। इसमें का एक अक्षर भी मिटाने की किसी में हिम्मत है तो वह सामने आकर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 173
एक क्षण के लिए तो खड़ा रहे। इन सबका अपराध क्या था? तो वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सारे कष्ट भोगने को तैयार हो गए थे। फिर भी, अभी कानपुर का कत्लेआम नहीं हुआ था। कानपुर के कत्लेआम के प्रतिशोध में नील ने यह कत्लेआम नहीं किया था,