का था जो परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से मेरा विरोध करते हैं और जो यह भ्रांति फेलाते है कि मेरे विश्लेषण एक-पक्षीय होते हैं, हालांकि वे मेरी उक्त पुस्तकों में ऐसा एक भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पाए। दूसरा निरीह स्वर उन सहृय मित्रों तथा पाठकों का था जो विवेकानन्द के बारे में मेरा मत जानना चाहते थे। इन्हीं में एक लघु पत्रिका के सम्पादक धर्मेन्द्र गुप्त भी थे, जिन्होंने मुझे लिखा-‘‘आपके मन में विवेकानन्द पर लिखने का विचार कैसे आया जबकि आप कम्युनिष्ट धर्म,
का था जो परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से मेरा विरोध करते हैं और जो यह भ्रांति फेलाते है कि मेरे विश्लेषण एक-पक्षीय होते हैं, हालांकि वे मेरी उक्त पुस्तकों में ऐसा एक भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पाए। दूसरा निरीह स्वर उन सहृय मित्रों तथा पाठकों का था जो विवेकानन्द के बारे में मेरा मत जानना चाहते थे। इन्हीं में एक लघु पत्रिका के सम्पादक धर्मेन्द्र गुप्त भी थे, जिन्होंने मुझे लिखा-‘‘आपके मन में विवेकानन्द पर लिखने का विचार कैसे आया जबकि आप कम्युनिष्ट धर्म,