जो मुझे उठा ले जाएगा और उठा भी ले जाए, तो क्या ग़म। यहां कौन-सा सुख भोग रही हूं।
रमा ने सावधन होकर कहा--आख़िर कुछ मालूम भी तो हो, क्या बात हुई?
जालपा--बात कुछ नहीं हुई, अपना जी है। यहां नहीं रहना चाहती।
रमानाथ--भला इस तरह जाओगी तो तुम्हारे घरवाले क्या कहेंगे, कुछ यह भी तो सोचो!
जालपा--यह सब कुछ सोच चुकी हूं, और ज्यादा नहीं सोचना चाहती। मैं जाकर अपने कपड़े बांधाती हूं और इसी गाड़ी से जाऊंगी।
यह कहकर जालपा ऊपर चली गई। रमा भी पीछे-पीछे यह सोचता हुआ चला,
जो मुझे उठा ले जाएगा और उठा भी ले जाए, तो क्या ग़म। यहां कौन-सा सुख भोग रही हूं।
रमा ने सावधन होकर कहा--आख़िर कुछ मालूम भी तो हो, क्या बात हुई?
जालपा--बात कुछ नहीं हुई, अपना जी है। यहां नहीं रहना चाहती।
रमानाथ--भला इस तरह जाओगी तो तुम्हारे घरवाले क्या कहेंगे, कुछ यह भी तो सोचो!
जालपा--यह सब कुछ सोच चुकी हूं, और ज्यादा नहीं सोचना चाहती। मैं जाकर अपने कपड़े बांधाती हूं और इसी गाड़ी से जाऊंगी।
यह कहकर जालपा ऊपर चली गई। रमा भी पीछे-पीछे यह सोचता हुआ चला,