रमानाथ--शर्म आती है किसी से कहते हुए।
जालपा--इसमें शर्म की कौन-सी बात है - कहते शर्म आती हो, तो खत लिख दो।
रमा उछल पडा, कितना सरल उपाय था और अभी तक यह सीधी-सी बात उसे न सूझी थी। बोला--हां, यह तुमने बहुत अच्छी तरकीब बतलाई, कल जरूर लिखूंगा।
जालपा--मुझे पहुंचाकर आना तो लिखना। कल ही थोड़े लौट आओगे।
रमानाथ--तो क्या तुम सचमुच जाओगी? तब मुझे नौकरी मिल चुकी और मैं खत लिख चुका! इस वियोग के दुःख में बैठकर रोऊंगा कि नौकरी ढूंढूगा। नहीं,
रमानाथ--शर्म आती है किसी से कहते हुए।
जालपा--इसमें शर्म की कौन-सी बात है - कहते शर्म आती हो, तो खत लिख दो।
रमा उछल पडा, कितना सरल उपाय था और अभी तक यह सीधी-सी बात उसे न सूझी थी। बोला--हां, यह तुमने बहुत अच्छी तरकीब बतलाई, कल जरूर लिखूंगा।
जालपा--मुझे पहुंचाकर आना तो लिखना। कल ही थोड़े लौट आओगे।
रमानाथ--तो क्या तुम सचमुच जाओगी? तब मुझे नौकरी मिल चुकी और मैं खत लिख चुका! इस वियोग के दुःख में बैठकर रोऊंगा कि नौकरी ढूंढूगा। नहीं,