इसलिए उसने इस अवसर पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई।
दयानाथ ने कहा, भाई, तुम जानो तुम्हारा काम जाने। मुझमें समाई नहीं है। जो आदमी अपने पेट की फिक्र नहीं कर सकता, उसका विवाह करना मुझे तो अधर्म-सा मालूम होता है। फिर रूपये की भी तो फिक्र है। एक हजार तो टीमटाम के लिए चाहिए, जोड़े और गहनों के लिए अलग। (कानों पर हाथ रखकर) ना बाबा! यह बोझ मेरे मान का नहीं।
जागेश्वरी पर इन दलीलों का कोई असर न हुआ, बोली-वह भी तो कुछ देगा-
इसलिए उसने इस अवसर पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई।
दयानाथ ने कहा, भाई, तुम जानो तुम्हारा काम जाने। मुझमें समाई नहीं है। जो आदमी अपने पेट की फिक्र नहीं कर सकता, उसका विवाह करना मुझे तो अधर्म-सा मालूम होता है। फिर रूपये की भी तो फिक्र है। एक हजार तो टीमटाम के लिए चाहिए, जोड़े और गहनों के लिए अलग। (कानों पर हाथ रखकर) ना बाबा! यह बोझ मेरे मान का नहीं।
जागेश्वरी पर इन दलीलों का कोई असर न हुआ, बोली-वह भी तो कुछ देगा-