गबन - Gaban



दयानाथ ने उदासीन भाव से कहा-'मैंने समझा दिया, मानने का अख्तियार तुम्हें है।'


यह कहते हुए दयानाथ दफ्तर चले गए। रमा के मन में आया, साफ कह दे, आपने निस्पृह बनकर क्या कर लिया, जो मुझे दोष दे रहे हैं। हमेशा पैसे-पैसे को मुहताज रहे। लड़कों को पढ़ा तक न सके। जूते-कपड़े तक न पहना सके। यह डींग मारना तब शोभा देता, जब कि नीयत भी साफ रहती और जीवन भी सुख से कटता।

रमा घर में गया तो माता ने पूछा-'आज कहां चले गए बेटा, तुम्हारे बाबूजी इसी पर बिगड़ रहे थे।'


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दयानाथ ने उदासीन भाव से कहा-'मैंने समझा दिया, मानने का अख्तियार तुम्हें है।'


यह कहते हुए दयानाथ दफ्तर चले गए। रमा के मन में आया, साफ कह दे, आपने निस्पृह बनकर क्या कर लिया, जो मुझे दोष दे रहे हैं। हमेशा पैसे-पैसे को मुहताज रहे। लड़कों को पढ़ा तक न सके। जूते-कपड़े तक न पहना सके। यह डींग मारना तब शोभा देता, जब कि नीयत भी साफ रहती और जीवन भी सुख से कटता।

रमा घर में गया तो माता ने पूछा-'आज कहां चले गए बेटा, तुम्हारे बाबूजी इसी पर बिगड़ रहे थे।'


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