जालपा-'यह बहुत अच्छा हुआ। लाओ, मुझे दे दो, अब न भेजूंगी।'
रमानाथ-'क्यों, कल भेज दूंगा।'
जालपा-'नहीं, अब मुझे भेजना ही नहीं है, कुछ ऐसी बातें लिख गई थी,जो मुझे न लिखना चाहिए थीं। अगर तुमने छोड़ दी होती, तो मुझे दुःख होता। मैंने तुम्हारी निंदा की थी। यह कहकर वह मुस्कराई।
रमानाथ-'जो बुरा है, दगाबाज है, धूर्त है, उसकी निंदा होनी ही चाहिए।'
जालपा ने व्यग्र होकर पूछा-'तुमने चिट्ठियां पढ़लीं क्या?'
रमा ने निद्यसंकोच भाव से कहा,हां, यह कोई अक्षम्य अपराध है?'
जालपा-'यह बहुत अच्छा हुआ। लाओ, मुझे दे दो, अब न भेजूंगी।'
रमानाथ-'क्यों, कल भेज दूंगा।'
जालपा-'नहीं, अब मुझे भेजना ही नहीं है, कुछ ऐसी बातें लिख गई थी,जो मुझे न लिखना चाहिए थीं। अगर तुमने छोड़ दी होती, तो मुझे दुःख होता। मैंने तुम्हारी निंदा की थी। यह कहकर वह मुस्कराई।
रमानाथ-'जो बुरा है, दगाबाज है, धूर्त है, उसकी निंदा होनी ही चाहिए।'
जालपा ने व्यग्र होकर पूछा-'तुमने चिट्ठियां पढ़लीं क्या?'
रमा ने निद्यसंकोच भाव से कहा,हां, यह कोई अक्षम्य अपराध है?'