जालपा-'मुझे भी लेते चलोगे न?'
रमानाथ-'तुम्हें परदेश में कहां लिये-लिये फिरूंगा? '
जालपा-'तो मैं यहां अकेली रह चुकी। एक मिनट तो रहूंगी नहीं। मगर जाओगे कहां? '
रमानाथ-'अभी कुछ निश्चय नहीं कर सका हूं।'
जालपा-'तो क्या सचमुच तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे? मुझसे तो एक दिन भी न रहा जाय। मैं समझ गई, तुम मुझसे मुहब्बत नहीं करते। केवल मुंह देखे की प्रीति करते हो।'
रमानाथ-'तुम्हारे प्रेम-पाश ही ने मुझे यहां बांधा रक्खा है। नहीं तो अब तक कभी चला गया होता।'
जालपा-'मुझे भी लेते चलोगे न?'
रमानाथ-'तुम्हें परदेश में कहां लिये-लिये फिरूंगा? '
जालपा-'तो मैं यहां अकेली रह चुकी। एक मिनट तो रहूंगी नहीं। मगर जाओगे कहां? '
रमानाथ-'अभी कुछ निश्चय नहीं कर सका हूं।'
जालपा-'तो क्या सचमुच तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे? मुझसे तो एक दिन भी न रहा जाय। मैं समझ गई, तुम मुझसे मुहब्बत नहीं करते। केवल मुंह देखे की प्रीति करते हो।'
रमानाथ-'तुम्हारे प्रेम-पाश ही ने मुझे यहां बांधा रक्खा है। नहीं तो अब तक कभी चला गया होता।'