गबन - Gaban



रतन-'तो इसके मानी यह हैं कि अब वह चीज़ न बनाएगा?'

जालपा-'जो चाहे समझ लो!'

रतन-'तो मेरे रूपये ही दे दो, बाज आई ऐसे कंगन से।'

जालपा झमककर उठी, आल्मारी से थैली निकाली और रतन के सामने पटककर बोली, 'ये आपके रूपये रखे हैं, ले जाइए।'

वास्तव में रतन की अधीरता का कारण वही था, जो रमा ने समझा था। उसे भ्रम हो रहा था कि इन लोगों ने मेरे रूपये ख़र्च कर डाले। इसीलिए वह बार-बार कंगन का तकाजा करती थी। रूपये देखकर उसका भ्रम शांत हो गया। कुछ लज्जित होकर बोली,


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रतन-'तो इसके मानी यह हैं कि अब वह चीज़ न बनाएगा?'

जालपा-'जो चाहे समझ लो!'

रतन-'तो मेरे रूपये ही दे दो, बाज आई ऐसे कंगन से।'

जालपा झमककर उठी, आल्मारी से थैली निकाली और रतन के सामने पटककर बोली, 'ये आपके रूपये रखे हैं, ले जाइए।'

वास्तव में रतन की अधीरता का कारण वही था, जो रमा ने समझा था। उसे भ्रम हो रहा था कि इन लोगों ने मेरे रूपये ख़र्च कर डाले। इसीलिए वह बार-बार कंगन का तकाजा करती थी। रूपये देखकर उसका भ्रम शांत हो गया। कुछ लज्जित होकर बोली,


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